Echo

(A short poem dedicated to Mr. Anshu Gupta of GOONJ. The Poem ‘Echo’ was awarded first place at the World Union of Poets – Telangana on 15th August 2016)

 

In the lull of the bewitching hour

a shadow veiled

like a Santa coeval

moves swift and spry

bearing salve of humanity.

The Samaritan apperceives

wealth & treasures a trivia

rallies & hollow speech a farce

for all a pauperized seeks

is a garb, a gulp & a morsel.

As the waters retreat

earth fall perch & fires ebb

the Knight comes a galloping

wagons of provender in tow

& resonating hooves of hope.

Seraph of the maidens

shielding their honor

for it is not just a piece of cloth

banishing the obsolete

his bugle of war echoes.

(c) Anita Desai August 2016

 

Rains

Clouds thunder & showers

Dot my sky

Rains drizzle

Then halt, and ponder

Glabrous terra, Lakes athirst

Ebbing brooks

Yet the soil moist

Who concours its deluge

They wonder

Behold!

A solitary mortal

Whose tears flood the plains

Praying hands

Beseeching eyes

Cries of atonement

Rent the air

For it is him, and

His like that pillaged

The terrene

Clouds thunder & showers

Dot my sky

& mull, To absolve bless or

Let it suffer in dearth

Razed cliffs, Beheaded stumps

A lull in buzz n chirps

Bleak contours of the sphere

Harden their will to abjure

Its thunder

No more a promise of lush, but

A cry of bereavement.

(c) Anita Desai May 2016.

जनाज़ा रिश्तों का (c) Dec 2016

मौत का सन्नाटा है

देखो, रिश्तों का जनाज़ा है

ना कोई शोर ना बिलखना

फूल है ना कोई चादर

है तो बस, ज़हर भरे नंगे रिश्ते

और रंजिशों के घने साये

कब्रिस्तान की पुरानी रूहें भी कांप उंठी

काले आसमाँ के अंधेरों से

और चीखते बादलों से

लाशें हैं जल रहीं

धुएं की कालिख उड़ रही

मगर चिंगारियां हैं गूंगी

काठ चरमराते नहीं

पर गर्म राख़ बिखर रही

मौत का सन्नाटा है

देखो, रिश्तों का जनाज़ा है.

(c) Anita Desai. Dec 2016

पानी

(C) Anita Desai March 2016

तू है गिरी मंडल  गामिनी , तू निर्मल जल धारा

तू है क्षीर शुभ्रा , तू हर वल्लभा

कोई करे प्रणाम तुझे , कोई महा  आरती

कोई भर ले कलश , कोई ले भर अंजुली !

तू नीर श्रेष्ठ, तू ही सबका जीवन दान

तू मानव का अंतिम पेय , तू ही अंतिम धाम

धरती की कोख तेरा वास, जल स्त्रोत तेरा तीर्थ स्थान

धरा की गोद से  हो जो उद्गम, हो पावन भूमि और चट्टान !

तू है बिंदु-सरस , तू करुणामयी

तू है भाग्यवती, तू मिटा दे हर त्राहि

धीरे से लुप्त होती सरिता , नर के अभिमान का परिणाम

डर के मनुष्य अब जिए, कर बहु-क्षीरा का अपमान !

तू है अमृत, और जीवन का आधार

तू है फिर भी मैली , के तेरे प्रवाह में बहते मानव के पाप

क्या है यह तेरा कोप, कहीं है सूखा और कहीं बाढ़

क्या अब है अधिकार मुझे , करूँ क्षमा की याचना !

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मातृभाषा

अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस , २१ फेब्रुअरी २०१६ 

सभ्यता का सम्पूर्ण स्त्रोत 

ममता और स्नेह का चंदन 

एवं लोरियों का मधुर वंदन 

मातृभाषा से मानव का परिचय प्रथम 

बालपन की पावन अठखेलियां

युवा हँसी के लचकते फव्वारे

और फूलों से झड़ते मीठे बोल

मातृभाषा में लिपटीं यादों की सुनहरी नदियां 

परिजनों  के मिलन का सेतु

भाई बहनों के प्रेम की रोली

और मित्र संबंधों का लंगर

मातृभाषा है जैसे आरती मंगल

तेरी भाषा मेरी भाषा 

सीखते सिखाते बीते दिन और वर्ष

पृथ्वी पर हम रहें जिस किसी भी ओर 

मातृभाषा की जड़ें बांधे रहें इक डोर

संस्कृती की पहली पहचान

त्यौहारों के गीतों की शान

संगीत और कला का मान

मातृभाषा है तुझे प्रणाम

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श्रीमती अनीता देसाई, हैदराबाद, भारत  

१९.०२.२०१६ 

Oasis

A short poem dedicated to the Women’s Division of Soka Gakkai International.

An oasis in the desert of life

A spring of hope in times of strife

Where mothers of Kosen Rufu reside

Cheerfully with them we abide.

 Rising to high self esteem

Inspiring all to cherish their dreams

Banishing the pall of gloom

Nurturing the colourful blooms.

A cascade of courage and wisdom

The Bodhisattvas are blithesome   

When young phoenixes sing

And vibrant blossoms swing.

 To the roar of the Lion King

Satans perish and the kind arise

Sheer darkness recedes

Peace and happiness precedes.

Enduring the burning sands

Fighting the devils and

Surging ahead with gratitude

And a forever gentle attitude.

In high spirits we live

Forever young we believe

Singing paeans to the lore

Nam Myoho Renge Kyo.